मानव जाति भविष्य में एक बहूत बड़े संकट से जूझने वाली है क्योंकि आज कल मशीने विश्व में ही नही,भारत में भी मनुष्यो की जगह ले रही है और दशको की आर्थिक वृद्धि और जनहित की अनेक योजनाओ के बावजूद भी तीन मे से एक भारतीय गरीबी रेखा के नीचे है।अधिकतर काम का मशीनीकरण होने से भारी मात्रा मे कमी आई है।ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के शोध मुताबित 47% नौकरीयां आने 20 वर्षो में आँटोमेशन के चलते खत्म होने की कगार पर हैं।
इंसानो के साथ एक समस्या और की आज का इंसान किसी एक चीज पर ज्यादा से ज्यादा 12 सेंकड ही ध्यान केंद्रित कर पाता है। हमारा ध्यान खींचने के लिए हमारे आस-पास और यहां तक कि हमारे भीतर बहुत सी चीजें हैं। अचानक फोन की घंटी बजती है और आप उसे उठाने के लिए लपकते हैं। फिर मोबाइल फोन पर तरह-तरह के संदेश, ई-मेल वगैरह आते रहते हैं।
उसके बाद उसका ध्यान कहीं और चला जाता है, वह खींचकर ध्यान को वापस लाता है, फिर भी वह वहां ज्यादा नहीं टिक पाता है। कई बार ध्यान भटकने की यह आदत एक आधुनिक रोग बन जाती है, जिसे कहते हैं अटेंशन डेफिसिट डिजॉर्डर। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह सब इसलिए है कि हमारे जीवन में बहुत सारी तकनीक और बहुत सारे उपकरण घुस आए हैं, जिनकी वजह से दिमाग में एक साथ बहुत सारी चीजें चलती रहती हैं। कारण जो भी हो, उद्योगों का कहना है कि इसकी वजह से कर्मचारी पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं कर पाते।
अब इसका जो समाधान सोचा जा रहा है, वह हमारी पूरी सभ्यता के लिए खतरे की घंटी है। पूरी दुनिया में ऐसी अनेक कोशिशें हो रही हैं कि उत्पादन प्रक्रिया में इंसान का उपयोग कम किया जाए और इसके लिए रोबोट के इस्तेमाल को बढ़ाया जाए। रोबोट में तमाम खासियतों के अलावा एक और चीज होती है कि उसके पास वह मन नहीं होता, जो इधर-उधर भटक सके। रोबोट शत-प्रतिशत ध्यान केंद्रित करके घंटों, बल्कि कई दिनों और महीनों तक काम कर सकता है। जाहिर है, वह हम इंसानों से ज्यादा उत्पादन दे सकता है।
उसके बाद उसका ध्यान कहीं और चला जाता है, वह खींचकर ध्यान को वापस लाता है, फिर भी वह वहां ज्यादा नहीं टिक पाता है। कई बार ध्यान भटकने की यह आदत एक आधुनिक रोग बन जाती है, जिसे कहते हैं अटेंशन डेफिसिट डिजॉर्डर। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह सब इसलिए है कि हमारे जीवन में बहुत सारी तकनीक और बहुत सारे उपकरण घुस आए हैं, जिनकी वजह से दिमाग में एक साथ बहुत सारी चीजें चलती रहती हैं। कारण जो भी हो, उद्योगों का कहना है कि इसकी वजह से कर्मचारी पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं कर पाते।
अब इसका जो समाधान सोचा जा रहा है, वह हमारी पूरी सभ्यता के लिए खतरे की घंटी है। पूरी दुनिया में ऐसी अनेक कोशिशें हो रही हैं कि उत्पादन प्रक्रिया में इंसान का उपयोग कम किया जाए और इसके लिए रोबोट के इस्तेमाल को बढ़ाया जाए। रोबोट में तमाम खासियतों के अलावा एक और चीज होती है कि उसके पास वह मन नहीं होता, जो इधर-उधर भटक सके। रोबोट शत-प्रतिशत ध्यान केंद्रित करके घंटों, बल्कि कई दिनों और महीनों तक काम कर सकता है। जाहिर है, वह हम इंसानों से ज्यादा उत्पादन दे सकता है।
दूसरी तरफ, कहा जा रहा है कि इंसान को देखने का यह तरीका ही गलत है। इंसान से मशीन की तरह एक लीक पर काम करते जाने की उम्मीद ठीक नहीं है। हम बहुत देर तक ध्यान एक जगह केंद्रित नहीं कर सकते, यही हमारी खूबी है। हमारा ध्यान हमेशा आस-पास की नई-पुरानी चीजों में भटकता है, जिससे हमें काम करने के नए तरीके, इनोवेटिव शॉर्टकट मिलते हैं।
ध्यान का भटकना हमारी रचनात्कता का एक बड़ा आधार है। लेकिन हमने ऐसी औद्योगिक सभ्यता विकसित कर ली है, जिसमें ध्यान लगाकर अधिक उत्पादन को ही कामयाबी का सबसे बड़ा पैमाना माना जाने लगा है। अटेंशन डेफिसिट पर शोध कर रहे मनोवैज्ञानिक कैरोलिन बीटन का कहना है कि हमें काम पूरा करने के लिए कई बार अपने आप से ही संघर्ष करना पड़ता है। कुछ लोग इस यूटोपिया पर भी सोचते रहे हैं कि जब रोबोट इंसान के लिए उत्पादन कार्य करें और इंसान सिर्फ रचनात्मक काम करे। जो भी हो, फिलहाल तो खतरा ही दिख रहा है।
ध्यान का भटकना हमारी रचनात्कता का एक बड़ा आधार है। लेकिन हमने ऐसी औद्योगिक सभ्यता विकसित कर ली है, जिसमें ध्यान लगाकर अधिक उत्पादन को ही कामयाबी का सबसे बड़ा पैमाना माना जाने लगा है। अटेंशन डेफिसिट पर शोध कर रहे मनोवैज्ञानिक कैरोलिन बीटन का कहना है कि हमें काम पूरा करने के लिए कई बार अपने आप से ही संघर्ष करना पड़ता है। कुछ लोग इस यूटोपिया पर भी सोचते रहे हैं कि जब रोबोट इंसान के लिए उत्पादन कार्य करें और इंसान सिर्फ रचनात्मक काम करे। जो भी हो, फिलहाल तो खतरा ही दिख रहा है।

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