भारत की अनेकता में एकता की विरासत पुरे विश्व में भारत का नाम रोशन किये हुए है|हर चंद मील के फासले पर जबान और बोलिया बदल जाती हैं| किसी और देश में इतनी भाषाओ के जानते वाले और धर्म को माने वाले मुस्किल से ही मिलेगे |यही भारत की ताकत है| इनको सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए
जरूरी है कि उनका उचित प्रचार-प्रसार हो। ऐसे में केंद्रीय माध्यमिक
शिक्षा बोर्ड द्वारा दसवीं कक्षा तक त्रिभाषा फामरूला लागू किए जाने का
फैसला नि:संदेह स्वागतयोग्य है। इससे हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत को
सहेजने का शिक्षा के रूप में अवसर मिलेगा।इससे बोर्ड से सम्बद्ध 18 हजार
स्कूलों में अब दसवीं क्लास तक हिंदी और अंग्रेजी के अलावा एक अन्य भारतीय
भाषा को पढ़ाया जा सकेगा। छात्रों के पास इस तीसरी भाषा के तौर पर भारतीय
संविधान की आठवीं सूची में सूचीबद्ध भाषाओं में से किसी एक को चुनने का
विकल्प होगा। काबिलेगौर है कि इसमें फिलहाल असमिया, बंगाली, गुजराती,
पंजाबी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, उड़िया, कश्मीरी, संस्कृत, तेलुगू, मैथिली
और उर्दू समेत 22 ऐसी भारतीय भाषाओं को सूचीबद्ध किया गया है, जो विभिन्न
राज्यों के लोगों द्वारा बोली जाती हैं। इसके दो फायदे हैं। अव्वल तो हिंदी
भाषी राज्यों के छात्रों को अपने ही देश की एक अन्य भाषा का ज्ञान होगा।दूसरे, उन राज्यों में जहां हिंदी नहीं बोली जाती है, उन्हें अंग्रेजी और अपनी इलाकाई जबान के इलावा हिंदी को सीखने का मौका मिलेगा।
इससे केवल भाषाई नहीं बल्कि संस्कृतियों के आदान-प्रदान के रूप
में देख सकते हैं; क्योंकि भाषा से सिर्फ उसकी लिपि या फिर बोली ही नहीं,
बल्कि उसमें मौजूद साहित्यक, सांस्कृतिक और सामाजिक खजाने का भी बोध होता
है।ऐसे में ये कहना बेजा नहीं होगा कि इससे हमारी एकता
को एक धागे में पिरोने और साम्प्रदायिक सौहार्द की डोर को मजबूत करने में
मदद मिलेगी। यही नहीं इन क्षेत्रीय भाषाओं के ज्ञान से छात्रों
को भी अनुवादक जैसे पदों पर नियुक्तियों के अवसर प्रदान होंगे। इस तरह
सीबीएसई के इस फैसले से बहुत सी नौकरियों के सृजन होने की भी उम्मीद है।
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